April 15, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

व्यंग्य- मीटिंग की महिमा।

 

अरुण कुमार कैहरबा
मीटिंगों की महिमा महान है। मीटिंगों में बिताया गया एक-एक पल महानता की सीढिय़ों पर चढ़ा सकता है। बताया जाता है कि महान क्रांतियों की नींव छोटी-छोटी मीटिंगों में रखी जाती है। यही मान कर कुछ लोग एक के बाद दूसरी..तीसरी..अनंत मीटिंगों का एक चक्र रचते हैं। एक मीटिंग में अगली मीटिंग का एजेंडा तय होता है। दूसरी मीटिंग में पिछली मीटिंग की समीक्षा और अगली मीटिंग का एजेंडा। पता ही नहीं चलता कि कब मीटिंगों से एजेंडा गायब हो जाता है। मीटिंगों के लिए मीटिंगें होने लगती हैं। मीटिंगों का चस्का लग जाता है। कोई जब महत्वपूर्ण काम करने के लिए कहे तो आप गर्व के साथ उसे जवाब दे सकते हैं-आज मैं मीटिंग में बिजी रहूंगा, इसलिए काम नहीं कर पाऊंगा। क्योंकि काम से ज्यादा मीटिंग महत्वपूर्ण हो जाती है। लोग अधिकारियों से मिलने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं और जवाब मिलता है-साहब मीटिंग में हैं।
मीटिंगें अहम एजेंडे से ध्यान भटकाने का भी जरिया हो सकती हैं। मीटिंगों के जरिये भली-भांति टाईम पास हो जाता है। कुछ हो या ना हो, मीटिंगों से यह लगता रहता है कि काम चल रहा है। कईं दिनों से चल रहे किसान आंदोलन को ही ले लें। किसान तीन कृषि कानूनों को काले कानून बता रहे हैं और तुरंत उसे वापिस लेने की मांग कर रहे हैं। आलोचकों ने जब सरकार पर आरोप लगाए कि सरकार किसानों के साथ बात ही नहीं करती। तो सरकार ने बात करने का ऐलान कर दिया। एक के बाद एक कईं दौर की मीटिंगें हो चुकी हैं। मीटिंग का कोई नतीजा नहीं निकलता। हां, एक मीटिंग में दूसरी मीटिंग की डेट जरूर तय हो जाती है। इन मीटिंगों की सरकार के लिए सबसे बड़ी सफलता यह है कि आलोचकों के मुंह बंद हो गए हैं। आखिर सरकार बात तो कर रही है। मीटिंग तो हो ही रही है।
मीडिया के लोगों को भी काम मिल जाता है। मीटिंग के बाद की खबर होती है-मीटिंग बेनतीजा..अगली मीटिंग.. को। उसके बाद अगली मीटिंग की बातचीत के कयास लगाए जाते हैं। आखिर मीटिंग में क्या हो सकता है? एक तरफ सरकार आंदोलित किसानों की जत्थेबंदियों के साथ मीटिंगें कर रही है। दूसरी तरफ कृषि कानूनों के पक्ष में नई मीटिंगों के लिए किसानों के संगठनों को पंजीकृत करवाकर माहौल बना रही है। अधिक से अधिक मीटिंगें होने पर लगता है कि अधिक से अधिक काम हो रहा है। इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम।
मीटिंगों की सफलता तब अधिक मानी जाती है, जब मीटिंगों में जलपान की व्यवस्था अच्छी हो। इसमें भी किसान आंदोलन ही अपवाद निकला है, जिसमें सरकार के मंत्रियों के साथ मीटिंग में जाते हुए भी किसान नेता लंगर का खाना लेकर जाते हैं। वरना तो सरकार को जरूरतमंद पाकर कितने ही ऐरे-गैरे किसान नेता बनकर जलपान के लालच में ही मंत्रियों के साथ मीटिंग करने जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हो रहा है कि मंत्री खुद फोटो ले-लेकर ट्वीट कर रहे हैं। दिल्ली किसानों से घिरी हुई है और सरकार किसानों से मीटिंगें कर रही है। समस्या का समाधान नहीं हो रहा, इसमें किसी का क्या कसूर। मीटिंगें तो चल रही हैं। हो सकता है कृषि कानूनों के पक्ष में मीटिंगें करने के लिए सरकार किसान नेताओं की भर्ती निकाल दे। क्योंकि बाकी कुछ हो या ना हो, बस मीटिंगें होती रहनी चाहिएं।
भवदीय,
अरुण कुमार कैहरबा
हिन्दी प्राध्यापक, व्यंग्यकार
वार्ड नं.-4, रामलीला मैदान, इन्द्री,
जिला-करनाल, हरियाणा
मो.नं.-9466220145