April 13, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

वायु की गति बढ़ने से दिल्ली में वायु गुणवत्ता में थोड़ा सुधार

दिवाली से कुछ दिन पहले मनाया जाने वाला करवा चौथ सही मायने में प्रेम, समर्पण, उल्लास और संस्कार का पर्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस व्रत का फल तभी है, जब व्रती भूलवश भी झूठ, कपट, निंदा, अभिमान न करे। इस व्रत से जहां पति के प्रति निष्ठा एवं समर्पण भाव परिलक्षित होता है, वहीं यह दाम्पत्य जीवन में आपसी विश्वास और भरोसे को मजबूत करने तथा संबंधों में मधुरता घोलने का पर्व है। समय के साथ कुछ बदलाव लाजिमी है और आजकल कुछ पुरुष भी पूरे दिन का उपवास रखकर पत्नी के इस कठिन तप में उनके सहभागी बनते हैं। इस व्रत में संस्कार हैं। पूजा-पाठ के बाद सुहागिनें अपनी सास के चरण स्पर्श कर उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस पर्व में उल्लास है। कई दिनों से इसकी तैयारी होती है।

करवा चौथ पर्व के संबंध में कई कथाएं हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार ‘करवा चौथ’ व्रत का उद्गम उस समय हुआ, जब देवों व दानवों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था और देवता परास्त होते नजर आ रहे थे। तब देवताओं ने ब्रह्माजी से उपाय की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने उन्हें सलाह दी कि अगर सभी देवों की पत्नियां सच्चे एवं पवित्र हृदय से अपने पति की जीत के लिए प्रार्थना एवं उपवास करें तो देवता दैत्यों को परास्त करने में अवश्य सफल होंगे। ब्रह्मा जी की सलाह पर समस्त देव पत्नियों ने कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया और रात्रि के समय चन्द्रोदय से पहले ही देवता दैत्यों से युद्ध जीत गए। तब चन्द्रोदय के पश्चात दिनभर की भूखी-प्यासी देव पत्नियों ने अपना-अपना व्रत खोला। मान्यता है कि तभी से इसी दिन करवा चौथ व्रत की परंपरा शुरू हुई।

एक कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार धनुर्धारी अर्जुन तप के लिए नीलगिरी पर्वत पर गए। उन्हें कोई संकट न आये, इस विचार से द्रोपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि पार्वती देवी ने भी एक बार भगवान शिव से बिल्कुल यही प्रश्न किया था और तब भगवान शिव ने उन्हें कहा था कि करवा चौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली तमाम छोटी-बड़ी बाधाओं को दूर करता है। द्रोपदी के आग्रह पर पूरी कथा सुनाते हुए कृष्ण ने बताया कि इन्द्रप्रस्थ नगरी में वेद नामक एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र व एक पुत्री थी। विवाह के बाद जब पुत्री पहले करवा चौथ पर मायके आई तो उसने वहीं व्रत रखा, लेकिन चन्द्रोदय से पूर्व ही उसे भूख सताने लगी। अपनी लाडली बहन की यह वेदना भाइयों से देखी न गई। उसके व्रत खोलने को तैयार नहीं होने पर भाइयों ने एक योजना बनाई। उन्होंने एक पीपल के वृक्ष की ओट में प्रकाश करके बहन को कहा कि देखो चन्द्रमा निकल आया है। बहन भोली थी, इसलिए भाइयों की बात पर विश्वास करके उसने उस प्रकाश को ही अर्घ्य देकर व्रत खोल लिया, लेकिन जब अगले दिन ससुराल पहुंची तो पति को बहुत बीमार पाया। दिन-ब-दिन पति की बीमारी बढ़ती गई। उसने मंदिर जाकर गणेश जी की स्तुति करनी शुरू की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उसके समक्ष प्रकट होकर कहा कि तुमने करवा चौथ का व्रत पूरे विधि विधान से नहीं किया, इसीलिए तुम्हारे पति की यह दशा हुई है। यदि तुम यह व्रत पूरे विधि विधान एवं निष्ठा के साथ करो तो तुम्हारा पति पूरी तरह ठीक हो जाएगा। उसके बाद उसने करवा चौथ का व्रत पूरे विधि विधान के साथ किया और इसके प्रभाव से उसका पति ठीक हो गया। कथा सुनाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी से कहा कि यदि तुम भी इसी प्रकार विधिपूर्वक सच्चे मन से करवा चौथ का व्रत करो तो तुम्हारे समस्त संकट अपने आप दूर हो जाएंगे। तब द्रोपदी ने करवा चौथ का व्रत रखा और उसके व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में पांडवों की विजय हुई। इस पर्व से संबंधित कई अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं।

शिव परिवार और चंद्रमा की होती है पूजा

महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए पूरा दिन व्रत रखती हैं और रात को चांद देखकर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलती हैं। इस व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, श्रीगणेश तथा चंद्रमा का पूजन करने का विशेष महत्व है। सुहागिनें यह व्रत 12-16 वर्ष तक हर साल निरन्तर करती हैं, उसके बाद वे चाहें तो इसका उद्यापन कर सकती हैं अन्यथा आजीवन भी यह व्रत कर सकती हैं। इस व्रत में महिलाएं करवा रूपी वस्तु या कुल्हड़ अपने सास-ससुर या अन्य स्त्रियों से बदलती हैं। सूर्योदय से पूर्व तड़के ‘सरगी’ खाकर सारा दिन निर्जल व्रत किया जाता है। कुंवारी कन्याओं और सुहागिन महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इस व्रत में मूल अंतर यही है कि जहां सुहागिनें चांद देखकर चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं तारों को ही अर्घ्य देकर व्रत खोल लेती हैं।

4 नवंबर को व्रत

ज्योतिषाचार्य मदन गुप्ता सपाटू के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी 4 नवंबर को 03:24 बजे शुरू होगी और अगले दिन 05:14 बजे समाप्त होगी। करवा चौथ पूजा मुहूर्त शाम 5:29 से 6:48 तक रहेगा। पंचांग के अनुसार चंद्रोदय का समय रात 8:15 बजे है। कई नगरों में यह पौने 9 से 9 बजे के मध्य दिखेगा।