April 15, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

राहुल गांधी को अच्छे सलाहकारों की बेहद जरूरत

-डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
काग्रेस के नेता राहुल गांधी जिस तरह से बचकाने बयान दे देते हैं, बचकानी हरकतें कर देते हैं इससे पता चलता है कि वे राजनीतिक दायित्व को निभाने के लिए गंभीर नहीं हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को हवाई जहाज के काकपिट से उतार कर भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया गया था, उन्होंने भी कुछ ही दिनों में बखूबी एक मंजे हुए नेता की तरह कार्यभार संभाल लिया था। प्रारंभ में अवश्य लगता था कि राजनीति से दूर रहा अनुभवहीन व्यक्ति भारत जैसे बहुधर्मी, सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया के दायित्व को कैसे संभाल पायेगा, लेकिन उन्होंने सभी के मिथक को झुठलाते हुए एक परिपक्व नेता की तरह अपना पद संभाला। राजीव गंाधी की इस कामयाबी का राज क्या था? इसका राज था उन्होंने अपनी एक अच्छी सलाहकार परिषद् सी बना रखी थी, जिसमें अरुण नेहरु जैसे मंजे हुए नेता सलाहकार थे। वे कोई भी फैसला अपने सलाहकारों की सलाह के बिना नहीं करते थे।
इसके उलट लगता है राहुल गांधी अपने आपको सक्षम मानते हुए गाहे बगाहे संसद में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के गले जबरदस्ती से मिलते हैं, उसपर आंख भी मारते हैं। और वे हंसी के पात्र बन जाते हैं। उनकी भाषा की अभद्रता किसी को नहीं भाती। आतंकवादियों के प्रति सम्मानजन शब्द और प्रधानमंत्री के नाम के साथ अपमानजनक शब्दों का उपयोग सबको नहीं भाता।
कांग्रेस अभी भी तीन दशक पूर्व की नीति पर चल रही है। उस समय की स्थिति कुछ और थी। तब कांग्रेस इस नीति पर चलती थी कि उसके तो परम्परागत वोटर हैं ही, अल्पसंख्यकों के साहवानो जैसे प्रकरणों को पलटकर उनके हितैषी बनकर अच्छा खासा वोटबैंक बना लिया जाय, और होता भी ऐसा ही था। किन्तु अब परिस्थितियां भिन्न हैं और नीति आपकी वही है। एक तो शोस्यल मीडिया जबरदस्त है, थोड़ी सी भी खबर मिनटों में व्यक्ति व्यक्ति को पहुंच जाती है। फिर उस समय कांग्रेस का शसक्त विक्लप नहीं था। धीरे धीरे भाजपा जैसा विकल्प उठ खड़ा हुआ, जो बहुसंख्यकों का हिमायती बन गया। अल्पसंख्यक समर्थन न करें तो न करें। संघ ने अपने यहां महिलाओं को प्रवेश दे दिया। भाजपा ने अपने पैर अल्पसंख्यकों की ओर भी पसार दिये। अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ बना लिया। तीन तलाक को अमान्य करके उस कांग्रेस की मानी जाने वाली आधी आवादी को अपने पाले में कर लिया। इधर राहुल गांधी ने कपड़ों के ऊपर से जनेऊ पहिन लिया। हिन्दूवादी लोगों ने कहा यह अच्छा ढकोसला है, उन्हें मूर्ख समझा है क्या? ये तो यज्ञोपवीत का अपमान है। मुस्लिमों ने सोचा ये पट्ठा कभी भी पाला बदल सकता है, विस्वास के योग्य नहीं है।
हाथरस की घटना के समय पीड़ित परिवार को हमदर्दी जताने जाते समय पुलिस द्वारा रोके जाने पर जब राहुल गांधी गिर गये तो लगा अब ये उठ जायेंगे, कुछ समझ आती जा रही है, किन्तु बिहार की चुनाव सभाओं में चीन के द्वारा भारत की जमीन पर कब्जे की बात सुनकर लगा घिसापिटा रिकार्ड अटक गया है, उसमें 12 सौ किलोमीटर और जुड़ गया। इनके पास स्थानीय मुद्दा बोलने को कुछ है ही नहीं। वहीं राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने वाले महागठवंदन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव के पास स्थानीय बिहार की जनता के सामने बोलने के लिए बहुतसारे स्थानीय मुद्दे हैं। यहां तक कि वह नीतीश जी व मोदी जी दोनों को टक्कर दे रहा है। इस चुनाव में तेजस्वी यादव को अच्छा फायदा मिलने वाला है। वह मुख्यमंत्री भी बन जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तेजस्वी की सभाओं में उमड़ रही भीड़ और नीतीश जी की हूटिंग से लग रहा है कि तेजस्वी ने अच्छा जनाधार बना लिया है। तेजस्वी यादव भले ही राहुलजी से आधी उम्र का हो, यदि राहुलजी चाहें तो उससे कुछ सीख ले सकते हैं। तेजस्वी के पास सभी बड़े नेताओं के जबाब रहते हैं। वह योजनाबद्ध तरीके से चुनावी मैदान में है। राहुल जी चाहें तो मुद्दों की कमी नहीं है, और राजनीति में मुद्दे तो पैदा किये जाते हैं। राहुल गांधी जी को एक अच्छे सलाहकार मण्डल की जरूरत है, जिसे हिदायत हो कि उसे साप्ताहिक स्पीच के लिए नई-नई बातें, नये नये मुद्दे चाहि, अवश्य मिलेंगे। तत्कालिक राजनीतिक हलचल चाहे पार्टी के अन्दर हो या बाहर, तीन चार सलाहकारों से मशविरा करें और त्वरित कदम उठायें। अपने मित्रों को अहमियत नहीं देना भी आपको अकुशल बना रहा है। सिन्धिया जैसे मित्र आपसे छिटक कर आपकी ही सरकार गिरवाकर भाजपा में चले गये। सचिन पायलट का ड्रामा काफी दिन चलता रहा, वे आपसे बिनती करते रहे, आपने अपना दरवाजा ही नहीं खोला। राजस्थान की सरकार तो गिरते गिरते केवल आरएसएस प्रमुख मोहन भागवतजी के उस वयान पर बची कि ’‘इन नेताओं को कैसे संभालोगे।’’ ये संकेत सुनकर भाजपा ने सचिन पायलट ग्रुप को भाव देना बंद कर दिया। पायलट की मजबूरी थी कांग्रेस में बने रहने की। अन्यथा नाकारा-निकम्मा कहे जाने के बाद भी कौन सा स्वाभिमानी नेता पुनः शरण में चला जाता। उस समय यदि राहुल गांधीजी अशोक गहलोत और सचिन पायलट से मिलकर वह समस्या समाप्त कर देते तो उनका कद बढ़ जाता। लेकिन लगता है वे कुछ करना ही नहीं चाहते। राहुल गांधी यदि सफल होना चहते हैं तो उन्हें बाक्पटु, राजनीति में परिपक्व, अनुभवी, अच्छे लेखक आदि सलाहकार रखना ही होंगे। और प्रत्युक घटना पर पैनी दृष्टि और रचनात्मक नई सोच को जाग्रत करना होगा।