January 19, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

कोेविड-19 ने बदल दिया पर्वों का स्वरूप:  भीतर के तमस से बाहर निकलकर एक नव जीवन की शुरूआत- स्वामी चिदानन्द सरस्वती

युरेशिया संवाददाता

ऋषिकेश, 20 अक्टूबर। परमार्थ निकेेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण हमारे पर्वों का स्वरूप बदला है परन्तु उसके मूल में जोे संदेश है वह यथावत है। नवरात्रि पर्व तमस को हरने वाली रात्रि का पावन अवसर है।
स्वामी जी ने कहा कि वैैसेे तो भारत में नवरात्रि का त्योहार विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। नवरात्रि के अवसर पर दिल्ली में ‘रामलीला’, पश्चिम बंगाल में ‘दुर्गा पूजा उत्सव’, गुजरात में ‘गरबा नृत्य’ का आयोजन तथा दक्षिण भारत में इस अवसर पर बोम्मई गोलू या नवरात्रि गोलू का आयोजन किया जाता है अर्थात् हस्तनिर्मित गुड़ियों का कलात्मक प्रदर्शन। वर्तमान में कोविड-19 के कारण सारेे पर्वों का स्वरूप ही बदल गया, लोगों के सोचने का ढ़ंग भी बदला हैै। कोरोना ने हमारी पर्व और संस्कृति तो नहीं परन्तु उनकोे मनाने का बाहरी ढ़ंग  बदल दिया है लेकिन लोगों की निष्ठा आज पहले से ज्यादा मज़बूत हुई है। वैसे तो भारत में कभी भी कोई एक संस्कृति पूर्ण रूप से व्याप्त नहीं रही क्योंकि हमेशा से हमारे यहां आध्यात्मिक संस्कृति की प्रमुखता रही है, पर्व और त्यौहार उसी संस्कृति का अहम हिस्सा है।
स्वामी जी ने कहा कि पर्व और त्यौहारों की संस्कृति तो भारत की आत्मा है क्योंकि इसी संस्कृति से हमारे समुदाय औैर समाज को संस्कारों का बोध कराया है। हमारे प्रत्येक पर्व का संदेेश हमारे आदर्शों और जीवन मूल्यों से है। भारत में मनाये जाने वाले पर्व संस्कार, सुधार, परिष्कार और शुद्धि का संदेश देते हैं। भारतीय पर्व और संस्कृति में कला, संगीत, नृत्य और मानव जीवन की अनेक उच्च स्त्तरीय उपलब्धियाँ सम्मिलित हैं। हमारे पर्व और त्यौहार हमें श्रेष्ठता की ओर बढ़ने का संदेश देते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति और पर्वों का सर्वाधिक सुव्यवस्थित रूप वैदिक युग में प्राप्त होता है। हमारे अनेक पर्वों और त्यौहारो का उद्भव वैदिक संस्कृति से ही हुआ है। वेद तो विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक माने जाते हैं जिसमें वैज्ञानिकता तथा आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय है इसलिये तो भारतीय संस्कृति उदात्त, समन्वयवादी एवं जीवंत बनी हुई है। हमारे ऋषियों ने हमें संपूर्ण विश्व एक परिवार है ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांत दिये, जिसमें आज भी हर भारतीय की गहरी आस्था है। ऐसे ही हमारे पर्व हमें संदेश देते है, जिनके मूल में गहरा संदेश और मानवता के सिद्धांत समाहित हैं ; समस्त मानव जाति के कल्याण के सूत्र समाहित हैे उन सूत्रों को आत्मासात कर जीवन में आगे बढ़ते रहे।
नवरात्रि के नौै दिन हमें यही संदेश देतेे हैं कि भीतर के तमस से बाहर निकलकर एक नव जीवन की शुरूआत करें।