October 23, 2020

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

एक सफर ऐसा भी… शुरू होते ही खत्म हुआ….!!

रचयिता-रेनू शर्मा(बडोनी)

बहुत हैरान व परेशान थी खामोशी के साथ सफर की शुरुआत कर ही दी…. तय समय पर ट्रेन आ गई!! कदम थोड़े रुके… दूसरे ही पल मन में आया नहीं…. अब पीछे नहीं हटूंगी और मैं चल पड़ी…. पूरी तरह आश्वस्त थी जो अभी तक जीवन में हुआ वह दुख की पराकाष्ठा थी और जो अब आगे होगा वह बहुत खूबसूरत होगा! इसी मानसिक उथल-पुथल के साथ ट्रेन के कोच में यथा स्थान पर बैठ गई… थोड़ी घबराहट से हुई… अगले ही पल दिल को कठोर किया… दिल से आवाज आई… क्या कर रही है…. अभी तो शुरुआत है इस तरह तो गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा!
यही सोचकर थोड़ा सुस्ता कर आराम की अवस्था में बैठ गई… सहसा चौकी… किसी के रोने की आवाज आई.. आंख खुली सामने देखा एक महिला बच्चे को सीने से लगाकर रोए जा रही थी शायद वह उसको खो चुकी थी!
एक आदमी उसके कंधे पर हाथ रखकर उसको सांत्वना देकर चुप कराने की कोशिश कर रहा था! शायद उस महिला का पति रहा होगा!यही सोच कर रहा नहीं गया आखिरकार पूछ ही लिया… वह उसका पति ही था! जब रोने की वजह पूछी तो पैरों के नीचे से जमीन मानो खिसक गयी… 22 सालों की कठोर तपस्या के बाद उनकी दो जुड़वा संतान हुई.. दोनों पुत्र.. मगर बदकिस्मती से पैदा होते ही एक की मृत्यु हो गई व दूसरे पुत्र को सांस लेने में दिक्कत होने लगी.. वह अपने कस्बे के डॉक्टर के पास गए डॉक्टर साहब बोले बच्चे के दिल में छेद है तुरंत शहर ले जाना पड़ेगा बहुत देर हुई तो बच्चे की जान भी जा सकती है! साथ में वह रोती हुई महिला कहे जा रही थी तुम दूसरा विवाह मत करना… जिज्ञासावस मैंने पूछा कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं उसका पति थोड़ा चौंका! फिर कहने लगा मेरी मां ने कहा है अगर इसकी औलाद नहीं हुई तो वह मेरा दूसरा विवाह करेंगी! मैं स्तब्ध थी और आगे का सारा दृश्य मेरी आंखों देखी था मैं विस्मित सी शून्य की तरफ बढ़ती चली गई उस व्यक्ति के यह शब्द हथौड़े की तरह मेरे दिल और दिमाग पर हावी हो रहे थे!
समझ नहीं आ रहा था उस महिला का कौन सा दुख बड़ा था बच्चों का जाने का या पति के दूसरे विवाह का इतनी घोर विडंबना… मेरे मानस पटल को झकझोर कर देने वाला था!
दूसरी तरफ मैं अपने आप से नज़रें नहीं मिला पा रही थी मेरे घर छोड़ने की वजह सिर्फ इतनी थी की मेरे पति को हर बार की तरह इस बार भी शादी की सालगिरह याद नहीं थी!
बहुत झगड़ा किया तत्पश्चात घर छोड़ने का फैसला किया… कि बस अब और नहीं! यहां मेरी भावनाओं की कद्र नहीं और अगले ही पल घर छोड़कर चली आई… सहसा अगले ही पल भावनाओं के द्वंद मे बढ़ते हुए अगले स्टेशन पर उतरी और पता नहीं कब पश्चाताप के आंसुओं के साथ अपने घर की चौखट पर खड़ी थी… और मेरे पति बाहें फैलाकर मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे वह गुलाब का फूल मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहने लगे शादी की सालगिरह मुबारक हो”!! असल मायने में वह दिन ही मेरी शादी की प्रथम सालगिरह थी…
उस महिला ने मुझे जिंदगी के असली मायने सिखा दिए….!!!!