August 2, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

रथयात्रा श्रीकृष्ण को दिल में विराजमान करने का उपक्रम

शिखर चंद जैन

कहते हैं हरि अनंत हरि कथा अनंता। यानी भगवान अनंत हैं, उनका कोई पार नहीं पा सकता और उनकी कथा भी अनंत है। इन कथाओं में एक यह भी है कि श्रीकृष्ण को वृंदावन छोड़े बहुत समय बीत चुका था। एक दिन उन्हें ब्रजवासियों की बड़ी याद सताने लगी। उनसे मिलने के लिए आकुल होकर श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को कुरुक्षेत्र में आमंत्रित किया। प्रभु का निमंत्रण कोई कैसे अस्वीकार करताॽ नंद बाबा और माता यशोदा सहित बड़ी संख्या में गोप और गोपियां भी आईं। राधा रानी कैसे पीछे रहतींॽ वे भी अपने मुरलीधर को दृष्टिभर देखने के लिए उनके साथ आ गईं। सभी ने कई बरसों बाद अपने गोपाल को देखा था, इसलिए बड़े भाव-विभोर और भावुक थे। लेकिन एक चीज ब्रज के वासियों को खटक रही थी। श्रीकृष्ण पहले जैसे नहीं दिख रहे थे। उनके माथे पर मोर-मुकुट नहीं, सोने का राज मुकुट था, भगवान के गले में वन के रंग-बिरंगे फूलों की माला नहीं सजी थी, बल्कि सोने का भारी भरकम हार था, उनके इर्द-गिर्द न तो रंभाती हुई प्यारी गौएं नजर आ रही थीं, न ही गौएं चराने वाले गोप। वे तो भारी भरकम, विशाल रथों, हाथियों और अपने सैनिकों से घिरे हुए थे।राधा रानी और सभी गोप-गोपियां एक-दूसरे की आंखों में झांक रहे थे। नंद बाबा और माता यशोदा भी आंखों ही आंखों में एक-दूसरे को संदेश दे चुके थे कि हमारा प्रिय गोपाल कहां हैॽ यह तो राजा कृष्ण हैं! यहां न तो यमुना का किनारा है, न वृंदावन के पक्षियों की चहचहाहट… मोर की पीऊं-पीऊं और यमुना के निर्मल जल की कल-कल के बजाय यहां तो रथों के पहियों का कर्कश घर्षण और खड़-खड़ की बेसुरी आवाज सुनने को मिल रही है!इन चीजों से ऊबकर राधा रानी और अन्य ब्रजवासी श्रीकृष्ण से प्रार्थना करने लगे, ‘हे कृपासिंधु! आप वृंदावन चलिए। यहां हमें खुशी का एक कणमात्र भी महसूस नहीं हो रहा है। कहां वृंदावन की माटी की सौंधी सुगंध, आपका वह बेपरवाह गोपालक रूप, यमुना की कल-कल, आपके अधरों पर सजी बांसुरी की मधुर ध्वनि… और कहां यहां का यह रूखापन…। ब्रजवासियों की प्रार्थना से श्रीकृष्ण का कोमल हृदय पिघल गया। कहते हैं कि श्रीकृष्ण को लौटा लाने के लिए वृंदावन वासियों की यह प्रार्थना, तरह-तरह से उनकी मनुहार और गोप-गोपियों द्वारा उनके रथ को खींचकर वृंदावन की ओर ले जाने का यह उपक्रम ही रथयात्रा है।रथयात्रा से पहले गुंडीचा मार्जन होता है। इस दिन चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्त अच्छी तरह गुंडीचा मंदिर की सफाई करते हैं। गुंडीचा मंदिर हमारे हृदय का प्रतीक है और रथयात्रा हमारे दिलों में श्रीकृष्ण को विराजमान करने का उपक्रम है। इसीलिए हम रथयात्रा के दौरान प्रभु की जय-जयकार लगाते हैं ताकि हमारा हृदय उनके नामोच्चार से पवित्र हो जाए।