August 2, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

विवादों से परे है ॐ का उच्चारण

महावीर प्रसाद

पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर ‘ॐ’ शब्द पर विवाद पैदा करने की कोशिश की गयी। असल में ॐ का उच्चारण तो विवादों से परे है। ॐ शब्द में अनन्त शक्ति है। इसमें बल है, बुद्धि है, जीवन है। ‘ॐ’ में इिन्द्रयाें का संयम है। ॐ पूरे शरीर को गतिशील करने की एक प्रक्रिया है। यह धर्म बंधनों से परे है। बिना विवाद के इसके उच्चारण का शारीरिक क्रियाओं में फायदा होता है। ॐ की व्याख्या आदिकाल से होती रही है। बहुत शोध के बाद इस शब्द की उत्पत्ति हुई होगी। कहा गया है-

‘माया त्रितत्वम‍् श्री बीजं राव हिनश्च यो मनु:। शक्ति हीन: स कथितो यस्य मध्ये न विद्यते।’

यानी जो मन्त्र राव से हीन हो और जिसके बीज में माया बीज ह्रीं त्रितत्व बीज प्रणव ॐ तथा श्री बीज श्रीं न हो वह शक्तिहीन कहलाता है। हर गौरी तंत्र में प्रस्तुत है- ‘मन्त्रणाम‍् पल्लवों वासो मन्त्रणाम‍् प्रणवः शिर:। शिर: पल्लव संयुक्तो मन्त्र: काम दुधो भवेत।।’

मन्त्रों का वास ही पल्लव है और शिर प्रणव है इनसे युक्त मन्त्र कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। भगवान श्री कृष्ण ने ॐ की महिमा बतायी है। इसका वर्णन गीता के आठवें अध्याय में इस तरह से है-

‘ओमित्येकाक्षर ब्रह्म व्याहरनमामनुस्मरान। य: प्रयाति व्यजनदेहम‍् स याति परमाम गतिं।’

अर्थात जो आदमी मन और इन्िद्रयों को वश में कर ॐ शब्द का जप करता है, वह ब्रह्म का स्मरण करता हुआ इस मौलिक देह को त्यागकर परम पद को प्राप्त होता है। देवताओं पर संकट के समय ॐ शब्द का उच्चारण किया गया।

  • तीन अक्षरों के संयोग का गूढ़ अर्थ

ॐ को ब्रह्मांड का प्रणव शब्द यानी सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ कहा जाता हैं जिसके बाद ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई थी। ब्रह्मांड में सब गतिमान हैं चाहे वह सूर्य तारा हो या आकाशगंगाएं। ब्रह्मांड में जो ध्वनि हमेशा गुंजायमान रहती है उसी ध्वनि को ही ॐ कहा गया है। अ, उ और म के संयोग से यह महत्वपूर्ण शब्द बना हुआ है। इन तीन अक्षरों का मतलब ब्रह्मा, विष्णु व महादेव से भी है। इसका सर्वप्रथम अक्षर ‘अ’ है जो मुख से निकलने वाला प्रथम अक्षर है व इसके उच्चारण से नाभि पर बल पड़ता हैं जो हमारी रचना को दर्शाता है। जब हम गर्भ में होते हैं व जन्म लेते हैं तब हम अपनी मां के द्वारा गर्भनाल से जुड़े होते हैं जो हमारी नाभि से निकलती है। हम अपना खाना-पीना सब इसी से प्राप्त करते हैं। दूसरा अक्षर ‘उ’ होता है। यह हमारे हृदय से निकलता हैं जो हमारे जीवन यापन का प्रतिनिधित्व करता है अर्थात यह विश्व के पालनहार भगवान विष्णु से संबंध रखता है। ॐ शब्द का अंतिम शब्द ‘म’ होता है, जो हमारे कंठ से निकलता है व वहां कंपन उत्पन्न करता हैं। कंठ भगवान शिव से संबंध रखता है।