April 15, 2021

युरेशिया

राष्ट्रहित सर्वोपरि

वैदिक यज्ञ का प्रतीक है होलिकोत्सव

अशोक ‘प्रवृद्ध’

होली का पर्व वास्तव में वैदिक यज्ञ है। वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि इस महापर्व के मूल में वैदिक सोमयज्ञ, नवानेष्टि यज्ञ का ही स्वरूप निहित है। वैदिक यज्ञों में सोम यज्ञ सर्वोपरि है, और प्राचीन काल में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सोमलता का रस निचोड़ कर उससे संपन्न किये जाने वाले यज्ञ को सोमयज्ञ कहा जाता था। भारत में प्रचलित चातुर्मास्य यज्ञ परम्परा में आषाढ़ मास (गुरु पूर्णिमा), कार्तिक मास (दीपावली), फाल्गुन मास (होली) तीन काल निर्धारित हैं –

फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत‍् सरस्य यत्फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी। अर्थात- फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्मास्य कहे जाते हैं ।

इन अवसरों पर आग्रहायण या नव संस्येष्टि यज्ञ किये जाने की परिपाटी है। रोग निवारण के लिए भी यज्ञ सर्वोत्तम साधन माना गया है। प्राचीन काल में सामूहिक यज्ञ की परम्परा थी। ऋतुओं के संधिकाल में होने वाले रोगों के निवारणार्थ भी यज्ञ किये जाने की परिपाटी थी। यह होली भी शिशिर और बसंत (वसंत) ऋतु का योग अर्थात संधिकाल में मनाया जाने वाला पर्व है।

उल्लेखनीय है कि अधजले अन्न को होलक की संज्ञा प्राप्त है, इसीलिए इस पर्व का नाम होलिकोत्सव पड़ गया। बसंत अथवा अन्य ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ अर्थात येष्ट किये जाने का विधान है। इसलिए बसंत ऋतु में इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि अर्थात बसंत ऋतु के

नवीन शष्य का यज्ञ है। इसका दूसरा नाम नव सम्वतसर है।

विशुद्ध प्राकृतिक उत्सव : प्राचीन काल में वासन्ती नव सस्येष्टि यज्ञ को होला, होलक और होलाका के नाम से भी जाना जाता था। अग्नि में भूने हुए अधपके फली युक्त फसल को होलक अर्थात होला कहा जाता है, अर्थात ऐसी फसल, जिन पर छिलका होता है, जैसे हरे चने आदि। भारत देश में ऋतु के अनुसार मुख्यतः दो प्रकार की फसलें होती हैं- खरीफ व रवि। बसंत ऋतु में आई हुई रवि की नवागत फसल को होम अर्थात हवन में डालकर फिर श्रद्धापूर्वक ग्रहण करने का नाम होली अर्थात प्राचीन कालीन वासन्तीय नवसस्येष्टि होलकोत्सव है। वसंत ऋतु के नये अन्न अर्थात अनाजों की आहुति से किया गया यज्ञ ही वासन्ती नव सस्येष्टि है। और होली होलक का अपभ्रंश है। होली शुद्ध रूप से प्राकृतिक पर्व है। होली के द्वितीय दिन की रंग-गुलाल खेलने की प्रथा भी एक प्राकृतिक उत्सव ही है। रासायनिक पदार्थों और प्रदूषण से बचते हुए आपसी मेल-मिलाप, एक दूसरे से प्रेम-सम्मान, शत्रुता भूलकर प्राकृतिक उपहार स्वरूप वसंत ऋतु में फूलने वाले फूलों का चूर्ण बनाकर उससे प्राप्त रंग को ससम्मान प्रसन्नतापूर्वक गले लगकर मलना, लगाना किसी प्राकृतिकोत्सव से कम नहीं। आयुर्वेद के अनुसार वसंत ऋतु में होलक अर्थात नवान्न को भून कर खाना तथा पलाश आदि फूलों के पानी से स्नान करना लाभदायक माना गया है। इसलिए भूने हुए नवान्न का सेवन और पलाश आदि फूलों को रात्रि में पानी में भिगोकर उससे प्राप्त पानी से सुबह स्नान करना चाहिए। ऐसे में हम सब को परस्पर मिलकर इस होली रूपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए अपने घर से स्वयं की अग्नि ले जाकर स्वयं आहुति देकर मन, वायु और पर्यावरण की शुद्धि के लिए यज्ञ हवन में छोटी सी आहुति देकर कल्याण कामना हेतु परमात्मा से प्रार्थना कर होलिकोत्सव को संसार के लिए शुभ, सुखद व कल्याणप्रद बनाने में सहभागी बनना ही चाहिए।